इश्क का दस्तूर ही कुछ ऐसा होता है, जो वफा करें आखिर वही रोता है।

इश्क में हम वफा करते करते  बेहाल हो गए, जिन्होंने की बेवफाई वो  खुशहाल हो गए।

काश तेरी वफा तेरे हुस्न के बराबर होती, उस पर एक किताब तो मैं लिख देता।

जब तक ना लगे ठोकर बेवफाई की, हर किसी को अपने महबूब पर नाज़ होता है।